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बच्चेदानी में गांठ होने पर मां बनने में आती है परेशानी, जानें क्या है इसका इलाज

महिला स्‍वास्थ्‍य By अनुराग अनुभव , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Jan 18, 2019
बच्चेदानी में गांठ होने पर मां बनने में आती है परेशानी, जानें क्या है इसका इलाज

गर्भाशय में गांठ महिलाओं के लिए एक खतरनाक रोग है क्योंकि इसके कारण महिला की मां बनने की क्षमता प्रभावित होती है और कई मामलों में महिला कभी गर्भवती नहीं हो पाती है। गर्भाशय में होने वाली गांठ, जिसे फाइब्रॉइड भी कहते हैं, महिलाओं में एक आम समस्या मा

गर्भाशय में गांठ महिलाओं के लिए एक खतरनाक रोग है क्योंकि इसके कारण महिला की मां बनने की क्षमता प्रभावित होती है और कई मामलों में महिला कभी गर्भवती नहीं हो पाती है। गर्भाशय में होने वाली गांठ, जिसे फाइब्रॉइड भी कहते हैं, महिलाओं में एक आम समस्या मानी जाती है। इस समस्या में महिला के गर्भाशय में कोई मांसपेशी असामान्य रूप से ज्यादा विकसित हो जाती है और धीरे-धीरे गांठ बन जाती है। ये एक तरह का ट्यूमर है। महिला के गर्भाशय में पाई जाने वाली ये गांठ मटर के दाने से लेकर क्रिकेट बॉल जितनी बड़ी हो सकती है। आइए आपको बताते हैं गर्भाशय में गांठ होने पर किन तरीकों से इसका इलाज किया जा सकता है।

बच्चेदानी में गांठ के क्या हैं लक्षण

जब यूटरस (गर्भाशय) की मांसपेशियों का असामान्य रूप से विकास होने लगता है तो उसे फाइब्रॉएड कहा जाता है। जब यह गर्भाशय की मांसपेशियों के बाहरी और अंदरूनी दोनों हिस्सों में हो सकता है। गर्भाशय में गांठ (फाइब्रॉइड) होने पर बांझपन की स्थिति हो सकती है। फाइब्रॉइड के लक्षण इस प्रकार हैं-
 

  • मासिक-धर्म के दौरान सामान्‍य से अधिक रक्‍तस्राव
  • यौन संबंध बनाते वक्‍त तेज दर्द
  • यौन संबंध के समय योनि से खून निकलना
  • मासिक धर्म के बाद भी रक्‍तस्राव

फाइब्रॉइड (गांठ) कैसे बनता है बांझपन का कारण

गर्भाशय में होने वाली गांठ के कारण अंडाणु और शुक्राणु आपस में मिल नहीं पाते हैं जिसका परिणाम बांझपन होता है। आनुवंशिकता, मोटापा, शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन की मात्रा का बढ़ना और लंबे समय तक संतान न होना इसके प्रमुख कारकों में से एक हैं। जिन महिलाओं की शादी 35-40 साल की उम्र के बाद होती है, उनमें इस समस्या का खतरा ज्यादा पाया जाता है।

गर्भाशय की गांठ का क्या है इलाज

फाइब्रॉइड के लिए इलाज के लिए पहले चीरा लगाया जाता था, जिसका घाव भरने में बहुत मुश्किल होती थी। लेकिन आजकल दूरबीन विधि से इसका उपचार करने में त्‍वचा पर कोई दाग नहीं रहता है। लेप्रोस्कोपी विधि से फाइब्रॉइड की सर्जरी वरदान की तरह है। चूंकि फाइब्रॉइड के कारण बनने वाली गांठें कैंसर नहीं पैदा करती हैं इसलिए इनका आसानी से उपचार संभव है। पहले ओपन सर्जरी द्वारा इसका उपचार होता था, जिससे मरीज को स्वस्थ होने में लगभग एक महीने या उससे अधिक समय लगता था। लेकिन अब लेप्रोस्कोपी की नई तकनीक के जरिये इस बीमारी का कारगर उपचार आसान हो गया है।

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कैसे बिना सर्जरी के ठीक किया जा सकता है फाइब्रॉइड

लेप्रोस्‍कोपिक तकनीक से उपचार के दौरान पेट में बड़ा चीरा लगाने के बजाय सिर्फ आधे से एक सेंटीमीटर का सुराख बनाकर दूरबीन के जरिये मॉरसिलेटर नामक यंत्र का उपयोग कर फाइब्रॉइड के छोटे-छोटे बारीक टुकड़े कर उसे बाहर निकाला जाता है। इस तरीके से उपचार के दौरान मरीज को अधिक तकलीफ नहीं होती, खून भी ज्यादा नहीं निकलता और सर्जरी के 24 घंटे बाद महिला घर जा सकती है।

इसके अलावा पॉलीविनाइल एल्कोहॉल के क्रिस्टल के जरिये फाइब्रॉयड की ऑर्टरी को ब्लॉक कर दिया जाता है, इससे ट्यूमर के लिए रक्त का प्रवाह रुक जाता है और ट्यूमर गलकर छोटे-छोटे टुकड़ों में पीरियड्स के साथ शरीर से बाहर निकल जाता है, लेकिन इलाज की यह प्रक्रिया ज्यादा महंगी है।

अगर आपको फाइब्रॉइड है तो इन बातों का ध्यान रखें

परिवार में किसी को फाइब्रॉइड की समस्‍या पहले रही हो तो प्रत्‍येक 6 महीने के अंतराल पर एक बार पेल्विक अल्ट्रासाउंड जरूर कराएं, जिससे कि शुरुआती चरण में ही इसका पता चल जाए। इससे बचाव के लिए स्‍वस्थ आहार के सेवन के साथ एक्‍सरसाइज को अपनी दिनचर्या में शामिल करें।

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