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शुगर की जांच खुद करने में है खतरा

डायबिटीज़ By अन्‍य , दैनिक जागरण / Jul 22, 2010
 शुगर की जांच खुद करने में है खतरा

डायबिटीज के मरीजों को जो पहली बात ध्‍यान में रखनी होती है वो है रक्‍त में शुगर का स्‍तर। आज बहुत से डायबिटीज़ के मरीज़ घर बैठे ही अपनी रक्‍तजांच कर लिया करते हैं। लेकिन हाल में हुए शोधों में यह बात सामने आयी है कि स्‍वयं ही रक्

 शुगर की जांचडायबिटीज के मरीजों को खून में शर्करा के स्तर (ब्लड शुगर लेवल) पर लगातार नजर रखने के लिए कहा जाता है। इसलिए टाइप-2 डायबिटीज के कई मरीज घर पर खुद इसकी जांच कर लिया करते हैं। डाक्टर इसकी सलाह भी देते हैं। लेकिन अब एक नए शोध से पता चला है कि खुद ब्लड शुगर लेवल की जांच करना डायबिटीज के लिए तो फायदेमंद है, लेकिन इससे दूसरी समस्याएं पेश होने का खतरा बढ़ जाता है। यह समस्या मरीज के तनावग्रस्त होने के रूप में सामने आ सकती है।

 

ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित अध्ययन रिपोर्टो के मुताबिक नियमित रूप से खून में शर्करा का स्तर जांचने वाले टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों में तनाव बढ़ने का खतरा ज्यादा पाया गया। गौरतलब है कि डायबिटीज के मरीजों में टाइप-2 डायबिटीज से पीडि़त लोगों की संख्या ही सबसे ज्यादा है। इस बीमारी में शरीर पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन का उत्पादन बंद कर देता है। नतीजा होता है कि शर्करा की पर्याप्त मात्रा ऊर्जा में नहीं बदल पाती।

ब्रिटिश अखबार 'द डेली टेलीग्राफ' में शुक्रवार को छपी रिपोर्ट के मुताबिक जो मरीज घर पर ही शर्करा के स्तर की जांच करते हैं, उनके बेचैनी और अवसाद की गिरफ्त में आने की आशंका उन मरीजों की तुलना में ज्यादा होती है जो घर पर यह जांच नहीं किया करते। एक अन्य शोध में कहा गया है कि नियमित जांच से भी इस स्थिति पर नियंत्रण नहीं पाया जा सकता।

 

यूनिवर्सिटी आफ यूल्स्टर के डा. मौरिस ओ'केन तथा उनके सहयोगियों ने एक साल तक किए गए शोध में पाया कि रक्त शर्करा के स्तर की नियमित जांच से हाइपोग्लाइकेमिया अटैक (वह स्थिति जब खून में शुगर का स्तर इस हद तक कम हो जाता है कि दिमाग की कार्यप्रणाली बाधित होने लगती है) की संख्या में कोई अंतर नहीं आता और खुद शर्करा स्तर जांचने वाले मरीज अपनी स्थिति में सुधार के बजाय अवसाद और बेचैनी के शिकार पाए गए।

 

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