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महिलाओं को खुशी देता है उनका शेप्ड फिगर

महिला स्‍वास्थ्‍य By अन्‍य , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Feb 04, 2011
महिलाओं को खुशी देता है उनका शेप्ड फिगर

एक महिला को सबसे ज्यादा खुशी मिलती है अपने शेप्ड फिगर को देखकर। एक अध्ययन के मुताबिक अपने प्यार से ज्यादा खुशी महिला को अपनी छरहरी काया को देखकर मिलती है।

 

एक महिला को सबसे ज्यादा खुशी मिलती है अपने शेप्ड फिगर को देखकर। एक अध्ययन के मुताबिक अपने प्यार से ज्यादा खुशी महिला को अपनी छरहरी काया को देखकर मिलती है। दूसरी तरफ मोटा होना एकाकी जीवन जीने से कहीं ज्यादा दुखदाई होता है। इतना ही नहीं, पतले होने से रिश्ते में ज्यादा संतोष का अनुभव होता है। विशेषज्ञों के अनुसार अधिक वजनदार होने से जुडी पीडा इतनी बडी हो चुकी है कि यह करीब-करीब जीवन के हर पक्ष को प्रभावित कर रही है। मूलचंद एंड मेडिसिटी हॉस्पिटल, नई दिल्ली की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. गगनदीप कौर कहती हैं, मोटापे से जितनी शारीरिक समस्याएं होती हैं, उतनी ही मानसिक समस्याएं भी होती जाती हैं। स्त्रियों के लिए खासतौर पर मोटापा मानसिक प्रभाव डालने वाला होता है। सन 1984 से 2008 के बीच 24 साल तक हजारों जर्मन लोगों के जीवन का अध्ययन किया गया और पाया गया कि अच्छा घरेलू जीवन एक चमकदार करियर से कहीं ज्यादा बेहतर होता है। इस अध्ययन से संबद्ध मनोचिकित्सक और हाउ टु बी अ हैप्पी ह्यूमन के लेखक डॉ. पैम स्पर कहते हैं, मैं बहुत सी मोटी महिलाओं के साथ काम कर चुका हूं। मैंने पाया कि उनके दिमाग में अधिक वजन की चिंता हरदम बनी रहती है। इसकी वजह यह है कि आज हम ऐसे समाज में रह रहे हैं जो अपने नैन-नक्श, आकार-प्रकार और आकर्षण को निरंतर निखारने में लगा हुआ है। मोटे लोगों पर अकसर टिप्पणी होती है कि यह मूर्ख और सुस्त है, जिसे अपनी जरा भी परवाह नहीं है। अध्ययन में बताया गया कि सामाजिक होना और कसरत करना जीवन में संतोष प्रदान करता है। अध्ययन के अनुसार कम काम करना अधिक काम करने की तुलना में हमें कहीं ज्यादा दुख पहुंचाता है। इस बारे में प्रोसीडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस में रिपोर्ट प्रकाशित हुई है।


वजन कंट्रोल करना है तो बत्ती बंद करके सोएं


अगर आप चाहते हैं कि आपका वजन नियंत्रण में रहे तो रात को सोते समय कमरे की बत्ती बंद रखें। एक नए अध्ययन में बताया गया है कि रात को सोने के दौरान कमरे में लगातार उजाला रहने का प्रभाव आपके चयापचय यानी मेटाबॉलिज्म पर पडता है, जो आपका वजन बढाता है। भले ही आपने अपने खाने की मात्रा में कोई बदलाव न किया हो। शोधकर्ताओं ने पाया कि रात को देर तक जगना और प्रकाश में काम करना हमारे खानपान की आदतों में बदलाव लाता है और इस दौरान ज्यादा खाना खाया जाता है। जबकि इसे समय चयापचय की क्रिया मंद होती है। प्रमाण बताते हैं कि शिफ्ट में काम करने वालों में दिल की बीमारी तथा डायबिटीज का जोखिम ज्यादा होता है। शोधकर्ता वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोग में कुछ चूहों को आठ सप्ताह तक रात को अपेक्षाकृत मंद प्रकाश में रखा, जबकि कुछ चूहों को रात में स्टैंडर्ड लाइट-डार्क यानी अंधेरे में रखा। अध्ययन का नेतृत्व करने वाले तथा ओहयो स्टेट यूनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट लाउरा फोंकेन के मुताबिक, चूहों को रोज दिए जाने वाले भोजन की मात्रा और उनकी गतिविधियों के स्तर में बिना किसी बदलाव के पाया गया कि जो चूहे रात भर प्रकाश में रहे, उनका वजन अंधेरे में रहने वाले चूहों की अपेक्षा बढ गया और वे मोटे हो गए। डायटीशिन डॉ. इशी खोसला कहती हैं, वजन का बढना साफ तौर पर न तो सिर्फ कैलरी लेना और उसे खर्च करना है, बल्कि यह हमारे शरीर की घडी (बॉडी क्लॉक) पर भी निर्भर करता है। डॉ. फ्रोंकन और उनकी टीम के अनुसार, प्रयोग के दौरान चूहे कम एक्टिव नहीं थे और न ही वे ज्यादा खा रहे थे, लेकिन वे अलग-अलग समय में खा रहे थे। रात को प्रकाश एक पर्यावरणीय कारक है जो मोटापे में बढोतरी कर रहा होता है, जिसके बारे में लोग सोच भी नहीं पाते।


गर्भ में ही पैदा हो जाता है टेक्नोलॉजी फोबिया


टीवी चैनल प्रोग्राम करने में पसीने छूटते हों या कोई नया गैजेट ट्राई करने में हिचक लगती हो तो शायद आपको टेक्नो-फोबिया है। तकनीक से लगने वाले इस अनजाने डर से निपटने के लिए समझ लीजिए कि आप ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। यह तो पैदा होने से पहले यानी गर्भ से ही इंसान के साथ जुड जाता है। गर्भ से निकलने वाले कुछ हार्मोन ये तय करते हैं कि तकनीक के प्रति बच्चे का रुझान कैसा होगा। बाथ यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि शुरुआती विकास के दौरान कम मात्रा में टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन मिलने से ब"ो में तकनीक के प्रति डर पैदा होता है, जबकि ज्यादा मात्रा में हार्मोन मिलने की वजह से वह तकनीक से प्रेम करने लगता है।


शराब व सिगरेट से होता है मुंह का कैंसर


हर वह इंसान जो सिगरेट और शराब पीता है, उसके लिए विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है। एक अध्ययन से यह पता चला है कि शराब और धूम्रपान तथा अस्वास्थ्यकर डाइट के चलते मुंह, गले और भोजन नली के कैंसर के मामलों में तेजी से वृद्धि हो रही है। अपर एरोडाइजेस्टिव ट्रैक्ट कैंसर्स (यूएडीटी) नामक बीमारियों के कारण अकेले ब्रिटेन में हर साल 10,000 से भी ज्यादा लोगों की मौत होती है। गले के कैंसर से जूझ रहे 66 वर्षीय हॉलीवुड स्टार माइकल डगलस इसका ताजा उदाहरण हैं, जिन्होंने इस बात को माना है कि उनके गले के कैंसर की वजह शराब और सिगरेट का सेवन है। अध्ययन में यह बात सामने आई है कि युवाओं में इस तरह का कैंसर अब सामान्य बात होती जा रही है। ऐबरडीन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने इसी मुद्दे पर अपना अध्ययन केंद्रित किया कि इसकी वजह क्या है। यूरोपीय यूनियन की आर्थिक मदद से हुए इस पांच वर्षीय शोध में 50 वर्ष से नीचे मुंह के कैंसर के 350 मरीजों का अध्ययन किया और उनकी तुलना 450 ऐसे मरीजों से की गई जिन्हें यह बीमारी नहीं थी। मुंह के कैंसर से पीडित में 10 में से 9 मामले ऐसे थे जो धूम्रपान और शराब के सेवन से तथा भोजन में फल-सब्जियों के अभाव की वजह से हुए थे। अध्ययन का नेतृत्व करने वाले प्रोफेसर गैरी मैकफार्लेन के मुताबिक, अपर एरोडाइजेस्टिव ट्रैक्ट कैंसर्स के मामले बढ रहे हैं और उनमें सबसे ज्यादा संख्या उन लोगों की है जिनकी उम्र 50 वर्षो से कम है। ब्रिटेन में पिछले 20 वर्षो में 40 से 49 वर्ष की उम्र के लोगों ऐसे मामले दोगुने हो गए हैं।


बोलने में दिक्कत है तो हिंदुस्तानी गीत गाएं


बोलने में होने वाली दिक्कत संबंधी व्याधि लारीनजील ट्रेमर्स का उपचार तलाशने के क्रम में अमेरिकी शोधकर्ता अब हिंदुस्तानी संगीत और मोजार्ट, वेनेगर, पुसीनी जैसे पश्चिमी शास्त्रीय संगीत का तुलनात्मक अध्ययन कर रहे हैं। मिसूरी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ हेल्थ प्रोफेशंस में संचार विज्ञान एवं विकृतियों के प्राध्यापक नंदू राधाकृष्णन ने कहा, हिंदुस्तानी एवं मोजार्ट जैसी शास्त्रीय गायन शैलियां काफी भिन्न हैं। उन्होंने कहा, हिंदुस्तानी गायन में प्रस्तुति देने वाला अपनी आवाज में स्वैच्छिक आधार पर उतार-चढाव लाने के लिए तान का इस्तेमाल करता है। शास्त्रीय संगीत में आवाज में बदलाव के लिए मुरकियां लेते हैं। इस ज्ञान के साथ हम ऐसी विशिष्ट उपचार पद्धति विकसित कर पाने में सफल हो सकते हैं जिससे लारीनजील ट्रेमर्स का इलाज हो सके। विश्वविद्यालय ने एक बयान में कहा कि राधाकृष्णन हिंदुस्तानी संगीत के मनोविज्ञान पर अध्ययन करने वाले पहले शोधकर्ता हैं। उन्होंने ओहिया में बाउलिंग ग्रीन राज्य विश्वविद्यालय के रोनाल्ड शेएरे और पश्चिम बंगाल में गायन के अध्यापक शांतनु बंद्योपाध्याय के साथ काम किया था। जर्नल ऑफ वॉयस में प्रकाशित अध्ययन में राधाकृष्ण ने हिंदुस्तानी एवं पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के बीच कई भिन्नताओं का पता लगाया है। राधाकृष्णन के अनुसार प्राथमिक भिन्नता यह होती है कि हिंदुस्तानी संगीत में आवाज के उतार-चढाव के मामले में गहरा अवरोह होता है। राधाकृष्णन के शब्दों में इसे तान का चलन कहते हैं। इसके विपरीत पश्चिमी शास्त्रीय संगीत में मुरकियां लगाई जाती हैं जिसमें आवाज में उतार-चढाव बहुत सुगम तरीके से किया जाता है। पश्चिमी गायक अपने गायन की आवृत्ति को बढाने के लिए एक विशिष्ट दायरे को बढाते हैं। इसमें कंठ को संकुचित कर और स्वर यंत्र को फैलाकर ऐसी आवाज निकाली जाती है और जो कानों को मधुर लगती है। लेकिन हिंदुस्तानी संगीत में गायक इस पद्धति का इस्तेमाल नहीं करता। वह पश्चिमी शास्त्रीय संगीत की तुलना में अपने स्वर को बेहद नीचे ले जाता है और गाते समय उसकी आवाज उसकी सामान्य स्थिति में बोली जाने वाली आवाज के बेहद करीब होती है।


गर्भाशय प्रत्यारोपण: एक उम्मीद की किरण


बांझपन हमारे समाज में एक अभिशाप की तरह माना जाता है। लेकिन अब इससे निपटने के उपचार ढूंढ लिए गए हैं। गर्भाशय प्रत्यारोपण के साथ बांझपन का उपचार करने की बात की जा रही है। बांझपन के उपचार में गर्भाशय प्रत्यारोपण महिलाओं के लिए आने वाले दिनों में उम्मीद की नई किरण पैदा करने जा रहा है। स्वीडिश वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने इस दिशा में प्रयोगात्मक आधार पर चिकित्सा प्रक्रिया में बडी सफलता हासिल की है, जो जल्द ही बांझ महिलाओं को गर्भवती होने का सुख देगी। गोथेनबर्ग के सेलग्रांसाक यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल की एक टीम ने प्रयोगशाला में चूहों पर इस नई परियोजना को लेकर सफल प्रयोग किए हैं और अब उन्हें उम्मीद है कि अगले दो साल में इंसानों पर इस प्रत्यारोपण की कोशिश की जाएगी। टीम प्रमुख डॉ. सीजर डियाज गार्सिया ने बताया, यह एक बडी सफलता है और उनके लिए अच्छी खबर है जिनका गर्भाशय सक्रिय नहीं है, लेकिन जो बच्चे चाहते हैं। अभी तक कोई यह साबित नहीं कर पाया था कि गर्भाशय प्रत्यारोपण के बाद महिला गर्भ धारण कर सकती है।


जिंदगी के दो और बूंद तैयार


ऊंची कीमत की वजह से गरीब बच्चों से दूर रहे दो और टीके अब राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल होकर उन तक पहुंचने वाले हैं। देश भर में 10 से 15 साल तक की लडकियों को अब रूबेला (जर्मन खसरे) का मुफ्त टीका दिया जाएगा। इसी तरह सरकार ने नवजात बच्चों को हीमोफीलियस इनफ्लूएंजा के टाइप-बी (एचआई-बी) के टीके की जरूरत को भी मान लिया है। हालांकि इससे जुडे विवादों और किसी दुष्प्रभाव की आशंका को देख पहले साल इसे सिर्फ दो राज्यों तमिलनाडु और केरल में ही शुरू किया जाएगा। भूटान और पाकिस्तान सहित दुनिया के 137 देश पहले ही अपने नवजातों को एचआई-बी का टीका दे रहे हैं, लेकिन भारत में यह फैसला काफी मुश्किल रहा है। टीकाकरण पर केंद्र सरकार के राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह ने यह तो माना है कि इसे राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल कर लिया जाना चाहिए, लेकिन बेहद सावधानी बरतते हुए इसे सिर्फ दो राज्यों में ही शुरू करने को कहा है। एनटीएजीआई की बैठक के दस्तावेजों के मुताबिक समूह के कुछ सदस्यों ने बैठक के दौरान भी इसका विरोध किया था। इन टीकों को लेकर भ्रम की स्थिति यह है कि एक तरफ विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ) का कहना है कि दुनिया भर में एचआई-बी संक्रमण से होने वाली मौतों में से 20 फीसदी हिंदुस्तान में होती हैं। अगर सभी बच्चों को समय पर टीके लग जाएं तो भारत में 75 हजार जिंदगियां आसानी से बच सकती हैं। तकनीकी सलाहकार समिति के सदस्य और सेंट स्टीफेन हॉस्पिटल में बाल रोग विभाग के प्रमुख जैकब पुलियल का हालांकि कहना है कि यह सिर्फ निजी टीका कंपनियों का फैलाया हुआ हौव्वा है। भारत में एचआई-बी के टीके को चार और दूसरे टीकों के साथ मिलाकर पंचमेल यानी पेंटावेलेंट रूप में दिया जाएगा। तकनीकी समूह के मुताबिक 56 देशों में कामयाबी के पूर्वक पेंटावेलेंट टीके लगाए जा रहे हैं।

Disclaimer

इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।

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