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फेफड़े के कार्सिनॉइड ट्यूमर से चिकित्सा

अन्य़ बीमारियां By Pooja Sinha , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Apr 15, 2013
फेफड़े के कार्सिनॉइड ट्यूमर से चिकित्सा

फेफड़े के कार्सिनॉइड ट्यूमर से चिकित्सा : कार्सिनॉइड ट्यूमर्स की चिकित्‍सा के लिए सर्जरी सबसे कारगर है। इसके अनेक विकल्प‍ हैं, आइए उन विकल्‍पों के बारे में जानें।

कार्सिनॉइड ट्यूमर का अगर जल्‍दी पता लग जाए तो पूरी तरह से सर्जरी का उपयोग कर हटाया जा सकता है। परन्‍तु अगर कार्सिनॉइड ट्यूमर का पता तब चलता है जब वह उन्‍नत स्थिति में हो तो पूरी तरह हटाना संभव नहीं हो सकता।

carcinoid tumor of the lung se chikitsaकुछ मामलों में, सर्जन जितना संभव हो उतना ट्यूमर को दूर करने की कोशिश करते है ताकि संकेत और लक्षणों को नियंत्रण करने में मदद मिल सकें।  

फेफड़ों के कार्सिनॉइड ट्यूमर्स ट्यूमर का एक असामान्य प्रकार है जो फेफड़ों में शुरू होता हैं और अन्‍य प्रकार के फेफड़ों के कैंसर की तुलना में धीमी वृद्धि करते हैं। फेफड़ों के कार्सिनॉइड ट्यूमर्स विशेष प्रकार की कोशिकाओं से बनते हैं जो न्‍यूरोएन्‍डोक्राइन कोशिका कहलाती हैं। कार्सिनॉइड ट्यूमर्स की चिकित्‍सा के लिए सर्जरी सबसे कारगर है। इसके अनेक विकल्प‍ हैं, आइए जानें उन विकल्‍पों के बारे में-

जब ट्यूमर बड़े एयरवे में स्थित होता है तो सर्जन ट्यूमर वाले एयरवे के उस हिस्से‍ को निकालते हैं।

जब ट्यूमर फेफड़े के किनारे पर स्थित हो तब सर्जन केवल फेफड़े की एक छोटी वेज़ निकालते हैं। बड़े ट्यूमर या कई ट्यूमर होने पर फेफड़े के एक हिस्से को या पूरे फेफड़े को निकालना पड़ सकता है।

गैस्ट्रोइंटेस्‍टाइनल ट्रैक्ट में पनपने वाले कार्सिनॉइड्स के उपचार के लिए ट्यूमर और आस-पास के लिम्फ नोड्स को सर्जरी के द्वारा निकालना अधिक प्रचलित है। परन्‍तु अतिरिक्त उपचार से पूरा ट्यूमर निकालना सर्जन की क्षमता या इस बात पर निर्भर करता हैं कि कार्सिनॉइड के लिम्फ नोड्स का फैलाव कहां तक हैं।
 
कार्सिनॉइड ट्यूमर्स पर कीमोथेरेपी अधिक कारगर नहीं होती है। वर्तमान में इसका इस्तेमाल केवल तभी किया जाता है जब कार्सिनॉइड ट्यूमर्स शरीर के अन्य हिस्सों में फैल जाते हैं और जब मरीज कीमोथेरेपी के साईड इफेक्ट सहन कर सकता हो।

जब कार्सिनॉइड ट्यूमर्स और इनसे बनने वाले हार्मोन असुविधाजनक लक्षण उत्पन्न करें तो सैंडोस्टेनटिन (आक्ट्रियोटाइड) नाम की दवा का इस्तेमाल किया जा सकता है। यह दवा सोमैटोस्टैटिन नामक प्राकृतिक हार्मोन से रासायनिक सम्बंधित होती है। इससे फ्लशिंग, डायरिया और अन्य लक्षणों में राहत देती है। इसका एक और लाभ हैं कि यह ट्यूमर की रोकथाम के साथ-साथ इसकी वृद्धि को कम करने में भी सहायक हो सकती है।

वैसे तो आक्ट्रियोटाइड कोई इलाज नहीं है और इसका इस्तेमाल भी तब किया जाता है जब यह रोग फैल चुका होता है। आक्ट्रियोटाइड का लम्बे समय तक कारगर स्वरूप, जिसे सैंडोस्टेटिन एलएआर कहा जाता है, अब उपलब्ध है और यह माह में एक बार दिया जा सकता है। एक और दवा लैन्रियोटाइड है जो आक्ट्रियोटाइड की तरह लम्बे समय तक कारगर रहती है और प्रत्येक 10 दिनों के बाद दी जा सकती है।

 

अल्फा-इंटरफेरॉन का इस्तेमाल भी आक्ट्रियोटाइड के साथ किया जा सकता है। यह पदार्थ शरीर के इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है जिससे ट्यूमर सिकुड़े और लक्षणों में सुधार हो सके।

एमआईबीजी, कार्सिनॉइड कोशिकाओं के द्वारा अवशोषित होकर उन्हें क्षतिग्रस्त करता है।


फेफड़े के कार्सिनॉइड ट्यूमर की संभावित अवधि

जैसा कि सभी कैंसर में होता है, कार्सिनॉइड ट्यूमर्स यदि ठीक हो जाएं, उनके फिर प्रकट होने की सम्भावना बनी रहती है।

 

 

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