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फेफड़े के कार्सिनॉइड ट्यूमर का निदान

अन्य़ बीमारियां By Pooja Sinha , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Apr 15, 2013
फेफड़े के कार्सिनॉइड ट्यूमर का निदान

फेफड़े के कार्सिनॉइड ट्यूमर का निदान : फेफड़े के कार्सिनॉइड ट्यूमर के निदान के उपाय चेस्‍ट के एक्स-रे और कम्यूटेड सीटी स्कैन से जाने जा सकते हैं, जानिए कैसे। 

फेफड़े के कार्सिनॉइड ट्यूमर के निदान के उपाय चेस्‍ट के एक्स-रे और कम्यूटेड सीटी स्कैन से जाने जा सकते हैं।

carcinoid tumor of the lung ke nidaanजब एक ट्यूमर एक्स-रे या सीटी स्कैन में एक धब्बे के रूप में दिखे तो ट्यूमर से कोशिकाओं को निकाल कर उनका मॉइक्रोस्कोप में टेस्‍ट किया जाता है। यह प्रक्रिया बायोप्सी कहलाती है। फेफड़े की बायोप्सी कई तरीके से की जा सकती है। आइए जानें फेफड़े के कार्सिनॉइड ट्यूमर का निदान करने के लिए कौन-कौन सी बायोप्‍सी की जाती हैं।

ब्रॉन्कोस्कोपी
ब्रॉन्कोस्कोपी का यह उपाय वहां पर कारगर होता है जहां पर ट्यूमर फेफड़ों के बीच स्थित होता हैं। इसमें एक फाईबर ऑप्टिक ट्यूब गले से फेफड़ों तक डाल दी जाती है। इसमें डॉक्टर ट्यूमर की जांच करने के लिए कोशिकाओं को निकाल भी सकते हैं।


नीडिल बायोप्सी  
इसमें नीडिल बायोप्‍सी से फेफडों के किनारों पर स्थित आपकी चेस्ट वॉल के पास से ट्यूमर से कोशिकाऐं निकाली जाती हैं। सीटी स्कैन की सहायता से डॉक्टर पसलियों के मध्य एक लम्बी सुई डालते हैं और इसका इस्तेमाल ट्यूमर से टिशू निकालने के लिए करते हैं।


थोरैकोटोमी चेस्ट कैविटी
इसको सर्जिकल तरीके से खोलकर की जाती है; कुछ मामलों में बायोप्सी जरूरी हो सकती है। कभी-कभी चेस्ट कैविटी में प्रवेश के लिये थोरैकोस्कोप का इस्तेमाल किया जा सकता है जो कि बायोप्सी प्राप्त के लिए खुली थोरैकोटामी से अपेक्षाकृत कम मुश्किल विधि है।


वीडियो की सहायता से की जाने वाली थोरैकोस्कोपिक सर्जरी में सर्जन चेस्ट वॉल पर एक छोटा छेद बनाते हैं। सर्जन फेफड़े और चेस्ट वॉल के बीच के खाली जगह में एक ट्यूब डालते हैं जिसके सिरे पर एक छोटा वीडियो कैमरा लगा होता है। सर्जन फेफड़ों के असामान्य टिशू की जांच के लिए फेफड़ों को सीधे देखते हैं। वे असामान्य दिखने वाले टिशू पर बायोप्सी टूल प्रयोग के लिए उसी ट्यूब का इस्तेमाल कर सकते हैं।

 

इसमें ब्‍लड और यूरीन टेस्‍ट भी किया जाता है यह देखने के लिए कि क्या ट्यूमर कोई असामान्य हार्मोन तो नहीं बना रहा है। आक्ट्रियोटाइड सिटीग्राफी कहें जाने वाले इस टेस्‍ट से यह सुनिश्चित करने में सहायता मिल सकती है कि कार्सिनॉइड ट्यूमर फेफड़े के बाहर तो नहीं फैल गया है।

 

रेडियोएक्टिव दवा की छोटी खुराक इंजेक्शन के मध्य से एक नस में छोड़ दी जाती है। दवा कार्सिनॉइड ट्यूमर्स को आकर्षित करती है। तब डॉक्टर दवा का संचय देखने के लिए एक कैमरा प्रयोग करते हैं जो रेडियोएक्टिविटी की खोज कर सकता है।

 

आक्ट्रियोटाइड के स्‍थान पर रेडियोएक्टिव एमआईबीजी का इस्तेमाल ऐसे ही एक अन्य परीक्षण में किया जाता है। एमआईबीजी एक ऐसा केमिकल है जिसे कार्सिनॉइड ट्यूमर्स ग्रहण कर लेता है। रेडियोएक्टिव ऑयोडीन को एमआईबीजी के साथ मिला कर नस में इंजेक्ट किया जाता है।



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