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    क्षय रोग का इतिहास

    ट्यूबरकुलोसिस By Nachiketa Sharma , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Mar 20, 2012
    क्षय रोग का इतिहास

    क्षय रोग का इतिहास: तपेदिक की शुरुआत कब हुयी यह बता पाना तो मुश्किल है, लेकिन यह हजारों सालों से इनसानी जिंदगी को प्रभावित करता आ रहा है।

    क्षय रोग यानी टीबी का इतिहास बहुत पुराना है। वेदों और आयुर्वेद के ग्रं‍थों में भी इसका उल्‍लेख मिलता है। लेकिन, फिर भी यह कब इंसानों में आया इसका सही समय बता पाना मुश्किल है।


     

    chhay rog ka itihaasक्षय रोग या तपेदिक (टीबी) प्राचीन काल से ही व्यक्ति को प्रभावित करती आ रही है। इस संक्रमण के फैलने की एक निश्वित तारीख नहीं है फिर भी मानवों में इसकी मौजूदगी के साक्ष्य लगभग 2400-3000 ई. पू. मिस्र के ममीज की रीढ की हड्डियों में मिले हैं। लेकिन माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस जंगली भैंसों में 18000 साल पहले मौजूद था। यह सं‍क्रमण आदमियों में इन भैंसों से ही आया।

     

    पूर्वी भूमध्य में ऐतिहासिक काल के मानव के कंकाल की जांच से पता चला है कि 7000 ई. पू. मानव में क्षय रोग मौजूद था। ग्रीक शब्द में क्षय रोग को पिथीसिस कहा जाता था। जिसकी वजह से आदमी को जबरदस्त बुखार और खांसी आती थी, और उस समय भी यह बहुत घातक बीमारी थी। इसको ग्रीक शब्द  में खूनी खांसी के नाम से भी जाना जाता था। दक्षिण अफ्रीका पैराकास संस्कृति (गुफाओं में रहने वाले लोग) में ट्यूबरकुलोसिस के साक्ष्य  700 ई.पू. से 100 ई. के मध्य तक मिले हैं।



    क्षय रोग पर लोक कहानियां-

    विज्ञान के आविष्कार से पूर्व क्षय रोग को पिशाच की बीमारी कहा जाता था। लोगों में यह अवधारण थी कि अगर इस बीमारी से घर के किसी भी सदस्य की मौत हो जाती है तो इसका असर घर के दूसरे सदस्य पर भी होता है। इससे घर के अन्य सदस्य की आंख लाल, खून की खांसी, चेहरा और त्वचा का पीला होना जैसे लक्षण दिखते थे और यह लगता था कि मरने वाले व्यक्ति की आत्मा उसे भी चाहती है।

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    भारत में क्षय रोग का इतिहास -


    भारतीय धार्मिक ग्रंथों में क्षय रोग का उल्लेख मिलता है। ऋगवेद (1500 ई.पू. लिखा गया) में क्षय रोग को यक्षमा कहा गया है, अथर्ववेद में इसे बालसा कहा गया है। सुश्रुत संहिता (620 ई.पू. लिखा गया) में इस रोग से बचाव के लिए मां का दूध, विभिन्न प्रकार के मांस, शराब और आराम का प्रयोग करने को कहा गया है। शिव पुराण में क्षय रोग का वर्णन मिलता है। इसकी कहानी के अनुसार दक्ष प्रजापति ने अपनी पुत्री के पति चंद्रमा को क्षय रोग होने का श्राप दिया था।

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    क्षय रोग पर वैज्ञानिक शोध-

    17वीं शताब्दी की चिकित्सा की किताबों में ट्यूबरकुलोसिस का उल्लेख वैज्ञानिक रूप से अध्ययन द्वारा किया गया। सिल्वियस ने 1679 में अपनी किताब “ओपेरा मेडिका” में ट्यूबरकुलोसिस के बारे में लिखा है, जिसमें इस बीमारी को फेफडे़ से जुडी बीमारी कहा गया है। इसके विभिन्न लक्षणों की वजह से इस बीमारी को एक बीमारी का नाम 1820 तक नहीं दिया जा सका और 1839 में जे.एल. स्कॉरलीन ने ट्यूबरकुलोसिस नाम का पहली बार प्रयोग किया । 1854 में हर्बर ब्रीमर (जो कि खुद टीबी के मरीज थे) ने ट्यूबरकुलोसिस के इलाज का विचार दिया। खान-पान, मौसम और स्‍थान में बदलाव करके ब्रीमर की बीमारी कुछ हद तक ठीक हुई। 1882 में रॉबर्ट कोच ने ट्यूबरकुलोसिस के कीटाणुओं का पता लगया। 1906 ई. में बीसीजी (बैसिलस काल्मेट-ग्यूरीन) वैक्सीन की खोज अलबर्ट और केमिली द्वारा की गई और आज भी इस टीके से 80 प्रतिशत तक टीबी के मरीजों का इलाज होता है।

     

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